क्यों बीच रास्ते ही गिर पड़े थे अर्जुन, भीम और द्रौपदी? सिर्फ युधिष्ठिर ही क्यों पहुंच पाए थे स्वर्ग?

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महाभारत युद्ध समाप्त होने और वर्षों तक हस्तिनापुर पर धर्मपूर्वक शासन करने के बाद, जब पांडवों और द्रौपदी ने सांसारिक जीवन त्यागने का निर्णय लिया, तो उन्होंने 'महाप्रयाण' (हिमालय के रास्ते स्वर्ग की ओर यात्रा) शुरू की। लेकिन इस दिव्य यात्रा में केवल युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग के द्वार तक पहुँच पाए थे।

द्रौपदी और बाकी चार पांडव रास्ते में एक-एक करके गिरते चले गए। जब भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा, तो युधिष्ठिर ने हर किसी के पतन के पीछे छिपे उनके अहंकार और सूक्ष्म दोषों का उत्तर दिया:

1. द्रौपदी (पक्षपात का दोष):
यात्रा में सबसे पहले द्रौपदी गिर पड़ीं। युधिष्ठिर ने बताया कि द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी थीं और उनका कर्तव्य सभी से समान प्रेम करना था, लेकिन उनके मन में अर्जुन के प्रति थोड़ा अधिक झुकाव (पक्षपात) था। इसी आंशिक विषमता के कारण वे स्वर्ग नहीं पहुँच सकीं।

2. सहदेव (अपनी बुद्धिमत्ता का अहंकार):
द्रौपदी के बाद सबसे छोटे पांडव सहदेव गिरे। सहदेव अत्यंत ज्ञानी, ज्योतिषी और भविष्यद्रष्टा थे। युधिष्ठिर के अनुसार, सहदेव को अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान पर यह अहंकार था कि दुनिया में उनके समान ज्ञानी कोई दूसरा नहीं है।

3. नकुल (अपने सौंदर्य का अभिमान):
इसके बाद नकुल का पतन हुआ। नकुल दिखने में अत्यंत सुंदर और आकर्षक थे। उन्हें अपने रूप और सौंदर्य पर अत्यधिक अभिमान था। वे मानते थे कि पूरे संसार में उनसे अधिक सुंदर कोई नहीं है।

4. अर्जुन (वीरता और शक्ति का घमंड):
नकुल के बाद महाधनुर्धर अर्जुन रास्ते में गिर पड़े। अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या और शौर्य पर गर्व था। उन्होंने युद्ध से पहले दावा किया था कि वे एक ही दिन में सभी शत्रुओं का नाश कर देंगे, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए थे। अपने बल का यह दंभ ही उनके पतन का कारण बना।

5. भीम (बल का अहंकार और अत्यधिक भूख):
अंत में महाबली भीम गिर पड़े। भीम के पतन के दो मुख्य कारण थे—पहला, उन्हें अपने असीम शारीरिक बल पर घमंड था और वे अक्सर दूसरों की ताकत को कम आंकते थे। दूसरा, वे अपने भोजन (क्षुधा) पर नियंत्रण नहीं रख पाते थे और अपनी आवश्यकता से अधिक खाते थे।

केवल युधिष्ठिर ही क्यों पहुँचे स्वर्ग?
युधिष्ठिर जीवनभर निष्पक्ष, सत्यवादी और धर्म के मार्ग पर चले। उनके मन में न तो अपनी विद्या या बल का कोई अहंकार था और न ही उन्होंने किसी के प्रति अन्याय किया। वे संपूर्ण यात्रा में एक कुत्ते (जो वास्तव में धर्मराज का स्वरूप था) को भी अपने साथ ले गए और उसे छोड़कर अकेले स्वर्ग जाने से इंकार कर दिया। इसी निःस्वार्थ धर्म और निरहंकार भाव के कारण वे सशरीर स्वर्ग में प्रवेश कर सके।

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