कौन था दुर्योधन का वो भाई… जिसने चीरहरण के समय द्रौपदी का दिया था साथ, कौरवों से भरी सभा में कही थी ये बात..

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PC: inkhabar

हिंदू महाकाव्य महाभारत कई अद्भुत, रहस्यमयी और धर्म-अधर्म के सूक्ष्म प्रसंगों से भरा हुआ है। ऐसा ही एक अविस्मरणीय और विचारणीय प्रसंग धृतराष्ट्र के पुत्र विकर्ण और द्रौपदी से जुड़ा है।

कौरव होकर भी धर्म के पक्ष में खड़ा था विकर्ण

विकर्ण, राजा धृतराष्ट्र और माता गांधारी के 100 पुत्रों में से एक था। वह दुर्योधन का भाई और कौरव पक्ष का ही सदस्य था, लेकिन अपने भाइयों के विपरीत वह अधर्म और अनीति का अंधभक्त नहीं था। जब द्यूतसभा में युधिष्ठिर ने अपना सब कुछ हारने के बाद द्रौपदी को दांव पर लगा दिया, तब द्रौपदी को भरी सभा में घसीटकर लाया गया।

उस समय भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और विदुर जैसे ज्ञानी व महारथी मौन साधे बैठे थे। द्रौपदी लगातार अपने सम्मान और धर्म को लेकर सवाल पूछती रही, लेकिन दुर्योधन के डर और सत्ता के प्रभाव में कोई भी गलत को गलत कहने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।

भरी सभा में द्रौपदी के लिए बुलंद की आवाज़

जब द्रौपदी ने तीखा सवाल उठाया कि—"जो व्यक्ति स्वयं को पहले ही दांव पर हार चुका हो, क्या उसे अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार था?"—तब इस धर्मसंकट पर पूरी सभा शांत थी।

ऐसे माहौल में अकेले विकर्ण ने अपने भाइयों के खिलाफ जाकर स्टैंड लिया। उसने स्पष्ट कहा कि द्रौपदी को दांव पर लगाना अधर्म था और उसके साथ किया जा रहा व्यवहार पूरी तरह से अनुचित है। विकर्ण की इस बात से क्रोधित होकर कर्ण ने उसे चुप रहने और इस मामले में हस्तक्षेप न करने की सलाह दी, लेकिन विकर्ण ने परिवार और सत्ता के दबाव से ऊपर उठकर अपने विवेक का परिचय दिया।

चीरहरण का विरोध और कुरुक्षेत्र में दुखद अंत

जब दुःशासन ने द्रौपदी का वस्त्रहरण शुरू किया, तब भी विकर्ण इस घृणित कार्य के खिलाफ था। हालांकि, अकेला होने के कारण वह अपने दबंग भाइयों को रोक नहीं सका।

इस कथा की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिस विकर्ण ने द्यूतसभा में द्रौपदी के सम्मान की रक्षा के लिए अपनी आवाज़ उठाई थी, उसे राजधर्म और कुल के प्रति निष्ठा के कारण कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरवों की ओर से ही लड़ना पड़ा। युद्ध के दौरान उसका सामना भीम से हुआ। भीम विकर्ण के न्यायप्रिय आचरण का सम्मान करते थे और उसे मारना नहीं चाहते थे, लेकिन युद्ध के नियमों के तहत अंततः भीम को विकर्ण का वध करना पड़ा।

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