जब कुरुक्षेत्र युद्ध में हनुमान जी ने खुद की थी अर्जुन के रथ की रक्षा: जानें कुरुक्षेत्र युद्ध के पीछे की यह अनोखी कथा

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कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध में अर्जुन और भगवान श्री कृष्ण का रथ पूरे युद्ध का केंद्र बिंदु था। अर्जुन के रथ को 'कपिध्वज' कहा जाता था क्योंकि इसके ऊपर हनुमान जी का सूक्ष्म रूप विद्यमान था। इस प्रसंग की शुरुआत पांडवों के वनवास काल के दौरान हुई थी।

एक बार जब अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या पर अहंकार हो गया था, तब उनकी भेंट एक वानर रूपी हनुमान जी से हुई। रामसेतु को लेकर हुई एक शर्त में हनुमान जी ने अर्जुन का अहंकार तोड़ा था। अपनी भूल का अहसास होने पर अर्जुन ने क्षमा मांगी। तब हनुमान जी ने प्रसन्न होकर अर्जुन को वचन दिया कि वे महाभारत के युद्ध में उनके रथ के ध्वज पर विराजमान रहकर उनकी रक्षा करेंगे।

युद्ध के दौरान भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों ने अर्जुन पर कई विनाशकारी दिव्यास्त्र चलाए। सामान्य रथ इन अस्त्रों के वार से पल भर में नष्ट हो जाता, लेकिन अर्जुन का रथ सुरक्षित रहा क्योंकि उसके सारथी स्वयं भगवान श्री कृष्ण थे और ऊपर हनुमान जी विराजमान थे, जो सभी अस्त्रों के तेज को संभाल रहे थे।

युद्ध समाप्त होने के बाद, श्री कृष्ण के उतरने और हनुमान जी के प्रस्थान करते ही वह भव्य रथ पल भर में जलकर राख हो गया। श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि वह रथ तो बहुत पहले ही दिव्यास्त्रों से नष्ट हो चुका था, वह केवल दिव्य शक्तियों की कृपा से ही युद्धभर सुरक्षित चल रहा था।

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