कर्ण और भानुमती के बीच हुआ कुछ ऐसा, टूट गया मोतियों का हार; दुर्योधन ने नहीं किया शक

s

महाभारत की कथाओं में रिश्तों और दोस्ती के कई अनोखे रंग देखने को मिलते हैं। श्रीकृष्ण और अर्जुन का रिश्ता प्रेम, मार्गदर्शन और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, वहीं कर्ण और दुर्योधन की मित्रता निष्ठा, सम्मान और अटूट विश्वास की कहानी कहती है। दुर्योधन ने कर्ण की प्रतिभा और वीरता को पहचाना और उसे सम्मान दिया। बदले में कर्ण ने भी जीवन के अंतिम क्षण तक अपने मित्र का साथ निभाने का संकल्प नहीं छोड़ा। इसी मित्रता से जुड़ी भानुमती, कर्ण और मोतियों के हार की एक बेहद प्रसिद्ध लोककथा आज भी सुनाई जाती है।

लोकप्रचलित कथा के अनुसार, एक दिन दुर्योधन की पत्नी भानुमती और कर्ण साथ बैठकर चौसर खेल रहे थे। दोनों खेल में इस कदर डूबे हुए थे कि उन्हें आसपास की गतिविधियों का ध्यान ही नहीं था। कहा जाता है कि उस समय कर्ण खेल में बढ़त बनाए हुए थे। तभी भानुमती को दुर्योधन के आने का आभास हुआ। पति को सामने आता देखकर वह सम्मानपूर्वक उठने लगीं।

कर्ण उस समय खेल में पूरी तरह मग्न थे। उन्हें लगा कि भानुमती खेल छोड़कर जा रही हैं। उन्हें रोकने के प्रयास में कर्ण ने उनका पल्लू पकड़ना चाहा। इसी दौरान भानुमती के गले में पड़ा मोतियों का हार टूट गया और उसके मोती फर्श पर बिखर गए। अचानक हुई इस घटना से वहां कुछ पल के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई। तभी दुर्योधन भी कक्ष में पहुंच चुके थे।

इस लोककथा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसके बाद आता है। दुर्योधन ने परिस्थिति को देखकर न तो कर्ण पर क्रोध किया और न ही अपनी पत्नी पर किसी तरह का संदेह जताया। इसके बजाय उन्होंने सहज भाव से मोतियों को समेटने की बात कही। उनका यह व्यवहार कर्ण के प्रति उनके गहरे विश्वास को दर्शाता है। दुर्योधन को अपने मित्र पर इतना भरोसा था कि उन्होंने घटना को गलत अर्थ देने के बजाय उसे सहजता से स्वीकार किया।

कर्ण के लिए दुर्योधन का यह विश्वास बेहद महत्वपूर्ण था। समाज में जन्म और पहचान को लेकर कर्ण ने अनेक अपमान सहे थे, लेकिन दुर्योधन ने उसे सम्मान, पद और पहचान दी। यही कारण था कि कर्ण जीवनभर उसके प्रति अपनी निष्ठा निभाता रहा।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भानुमती के मोतियों का हार टूटने वाली घटना महाभारत के मूल संस्कृत ग्रंथ में प्रमाणित रूप से नहीं मिलती। यह बाद की लोकपरंपराओं में प्रचलित कथा है। इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय महाभारत से जुड़ी लोकप्रिय लोककथा के रूप में देखना उचित है।

From Around the web