Offbeat: जब युधिष्ठिर ने एक कुत्ते के लिए ठुकरा दिया था स्वर्ग का सुख, जानें कौन था वह रहस्यमयी कुत्ता

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pc: in khabar

महाभारत का महायुद्ध समाप्त होने और धर्मराज युधिष्ठिर के हस्तिनापुर का राजपाट संभालने के बाद, जब पांडवों ने संसार से विदा लेने का फैसला किया, तो उन्होंने हिमालय की ओर 'महाप्रस्थान' यात्रा शुरू की।

इस कठिन यात्रा के दौरान एक-एक करके द्रौपदी और चारों पांडव (सहदेव, नकुल, अर्जुन व भीम) शरीर त्यागते चले गए। लेकिन युधिष्ठिर बिना रुके आगे बढ़ते रहे। इस पूरी यात्रा में केवल एक रहस्यमयी कुत्ता ही अंत तक उनके साथ चलता रहा।

हिमालय के अंतिम पड़ाव पर स्वयं देवराज इंद्र अपने दिव्य रथ के साथ प्रकट हुए और युधिष्ठिर को सदेह (शरीर सहित) स्वर्ग चलने का निमंत्रण दिया। युधिष्ठिर ने रथ में बैठने से पहले अपने साथी कुत्ते को भी साथ ले जाने की बात कही। इस पर इंद्र ने स्पष्ट मना करते हुए कहा कि स्वर्ग में किसी पशु के लिए स्थान नहीं है, इसलिए वे इसे यहीं छोड़ दें।

युधिष्ठिर ने अपनी करुणा और धर्मनिष्ठा का परिचय देते हुए इंद्र का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि जो जीव हर संकट और कठिन मार्ग में उनके साथ खड़ा रहा, उसे केवल अपने सुख और स्वर्ग के लोभ में छोड़ देना अधर्म होगा।

युधिष्ठिर के इस अटल फैसले के तुरंत बाद वह कुत्ता अपने वास्तविक रूप में आ गया। दरअसल, वह कोई साधारण जीव नहीं बल्कि स्वयं धर्मदेव थे, जो अपने पुत्र युधिष्ठिर की अंतिम परीक्षा ले रहे थे। धर्मदेव यह देखना चाहते थे कि परम सुख सामने होने पर भी युधिष्ठिर धर्म, दया और निष्ठा का त्याग करते हैं या नहीं। युधिष्ठिर इस परीक्षा में पूरी तरह सफल रहे और सदेह स्वर्ग पहुंचे।

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