Offbeat: जब श्रीकृष्ण को लेना पड़ा स्त्री रूप, महाभारत की सबसे अनोखी प्रेम और त्याग की कथा

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महाभारत की विशाल गाथा में कई ऐसे प्रसंग छिपे हैं जो न केवल धर्म और युद्ध से परे हैं, बल्कि समाज और आस्था के एक अनोखे रूप को दर्शाते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत प्रसंग है इरावन (अरावन) और भगवान श्री कृष्ण के मोहिनी रूप का विवाह, जो आज भी तमिलनाडु के कूवागम में किन्नर (ट्रांसजेंडर) समुदाय की अटूट आस्था का केंद्र है।
कथा के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध में पांडवों की विजय के लिए एक सर्वगुण संपन्न राजकुमार की बलि (नरबलि) दी जानी थी। अर्जुन और नाग राजकुमारी उलूपी के पुत्र इरावन ने धर्म की रक्षा के लिए सहर्ष स्वयं को समर्पित कर दिया। हालाँकि, उनकी एक अंतिम इच्छा थी—वे अविवाहित नहीं मरना चाहते थे। समस्या यह थी कि अगले ही दिन इरावन की मृत्यु तय थी, इसलिए कोई भी कन्या उनसे विवाह करने को तैयार नहीं हुई।
इस धर्मसंकट को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं अत्यंत सुंदर मोहिनी रूप धारण किया और इरावन से विवाह रचाया। दोनों ने एक रात साथ बिताई और अगले दिन सुबह इरावन ने अपनी बलि दे दी। इरावन की मृत्यु के पश्चात मोहिनी रूपी श्री कृष्ण ने एक पारंपरिक विधवा की तरह शोक मनाया, अपनी चूड़ियां तोड़ीं और सफ़ेद वस्त्र धारण किए।
आज भी यह पौराणिक कथा तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में स्थित कूवागम गांव के 'कूथांदवर मंदिर' में जीवंत हो उठती है। हर साल यहाँ 18 दिनों का भव्य मेला आयोजित होता है। उत्सव के 16वें दिन, देश-विदेश से आया किन्नर समुदाय खुद को मोहिनी मानकर दुल्हन की तरह सजता है और मंदिर के पुजारी उनके गले में मंगलसूत्र (थाली) बांधते हैं। पूरी रात जश्न और नृत्य के बाद, अगले दिन सुबह इरावन की बलि का प्रतीकात्मक मंचन होता है। इसके बाद सभी दुल्हनें अपना मंगलसूत्र तोड़कर, श्रृंगार उतारकर एक विधवा की तरह शोक मनाती हैं।
श्री कृष्ण का स्त्री रूप धारण कर विवाह करना यह संदेश देता है कि ईश्वर की दृष्टि में हर जीव समान है। कूवागम का यह उत्सव प्रेम, त्याग और ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान का एक अनोखा संगम है।
