Mahabharata: क्यों दासी के पुत्र के रूप में जन्मे यमराज? जानें महात्मा विदुर के जन्म और ऋषि मांडव्य के श्राप की कहानी

d

 PC: IN KHABAR

महाभारत में महात्मा विदुर का चरित्र एक ऐसे ज्ञानी और नीतिज्ञ के रूप में सामने आता है, जो राजमहल में रहते हुए भी सदैव धर्म और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। धृतराष्ट्र और पांडु के भाई होने के बावजूद विदुर को राजसिंहासन का अधिकार नहीं मिला। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महात्मा विदुर कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं धर्मराज (यमराज) के अवतार थे, जिन्हें एक ऋषि के श्राप के कारण पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ा था।

ऋषि मांडव्य को क्यों मिली शूल की सजा?
कथा के अनुसार, एक बार ऋषि मांडव्य अपने आश्रम में ध्यान में लीन थे। तभी कुछ चोर चोरी का सामान लेकर उनके आश्रम में छिप गए। पीछा करते हुए राजा के सैनिक पहुंचे, लेकिन ध्यान में लीन ऋषि ने सैनिकों के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। सैनिकों ने ऋषि को भी चोरों का साथी समझकर बंदी बना लिया और राजा के आदेश पर शूल (सूली) पर चढ़ा दिया। हालांकि, अपनी तपस्या के बल पर ऋषि जीवित रहे। बाद में राजा को जब अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उन्होंने ऋषि से क्षमा मांगकर उन्हें शूल से उतारा।

बचपन की भूल और यमराज को श्राप
इस घटना से आहत होकर ऋषि मांडव्य ने धर्मराज (यमराज) से पूछा कि उन्हें किस अपराध के कारण इतना कठोर दंड मिला? धर्मदेव ने बताया कि बाल्यकाल में उन्होंने एक छोटे से कीड़े को घास की नोक से छेदा था, उसी कर्म का यह फल है।

ऋषि मांडव्य इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुए। उनका मानना था कि बाल्यावस्था में अनजाने में किए गए छोटे से अपराध के लिए इतना कठोर दंड अन्यायपूर्ण है। क्रोधित होकर ऋषि ने धर्मराज को श्राप दिया कि उन्हें पृथ्वीलोक पर एक शूद्र (दासी) के गर्भ से मनुष्य रूप में जन्म लेना होगा।

दासी पुत्र के रूप में विदुर का जन्म
ऋषि के इसी श्राप के कारण धर्मदेव को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। हस्तिनापुर में नियोग परंपरा के दौरान महर्षि वेदव्यास के तेज और आशीर्वाद से एक दासी के गर्भ से विदुर का जन्म हुआ। दासी पुत्र होने के कारण ज्ञान, नीति और बुद्धिमत्ता में श्रेष्ठ होने के बावजूद उन्हें हस्तिनापुर के सिंहासन का उत्तराधिकार नहीं मिला।

विदुर नीति का संदेश
राजसत्ता भले ही विदुर के पास नहीं थी, लेकिन उनकी नीति और ज्ञान की प्रतिष्ठा पूरे कुरुवंश में थी। उनकी कही गई बातें आज भी 'विदुर नीति' के रूप में प्रासंगिक हैं। विदुर का जीवन यह संदेश देता है कि मनुष्य का मूल्य उसके जन्म या सामाजिक पद से नहीं, बल्कि उसके कर्म, ज्ञान और विवेक से तय होता है।

From Around the web