Mahabharata: जब कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण को उठाना पड़ा था चक्र, जानें भीष्म और कृष्ण की उस प्रतिज्ञा का रहस्य

PC: Amar ujala
महाभारत का युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह धर्म, वचनों और मर्यादाओं की एक बड़ी परीक्षा थी। कौरव सेनापति पितामह भीष्म और भगवान श्रीकृष्ण के बीच का एक ऐसा ही प्रसंग बेहद लोकप्रिय है, जब युद्ध के दौरान स्थिति इतनी विकट हो गई कि स्वयं भगवान कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर चक्र उठाना पड़ा था। आइए जानते हैं उस ऐतिहासिक घटना और उसके पीछे के गहरे रहस्यों के बारे में:
जब भीष्म के प्रहार से कांप उठी थी कौरव-पांडव सेना
महायुद्ध के शुरुआती दिनों में पितामह भीष्म का पराक्रम ऐसा था कि उनके सामने टिकना देवताओं के लिए भी असंभव सा प्रतीत होता था। भीष्म ने प्रतिज्ञा ली थी कि वे पांडवों का वध अवश्य करेंगे या फिर श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाने पर विवश कर देंगे।
अर्जुन की रक्षा: युद्ध के दसवें दिन जब भीष्म के बाणों ने पांडव सेना में तबाही मचा दी और अर्जुन के रथ को गंभीर क्षति पहुँचाई, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी।
पांडवों की आसन्न पराजय को देख भगवान श्रीकृष्ण का धैर्य डोल गया, क्योंकि उन्होंने युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिज्ञा ली थी कि वे हाथ में कोई शस्त्र नहीं उठाएंगे।
जब श्रीकृष्ण ने उठایا चक्र
अर्जुन की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सारथि का दायित्व एक क्षण के लिए थामा और रथ से नीचे उतर आए।
क्रोध में आगे बढ़े माधव: अपने भक्तों और पांडवों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र का स्मरण किया और अत्यंत क्रोधित मुद्रा में भीष्म की ओर बढ़ने लगे।
भीष्म की भक्ति: श्रीकृष्ण को चक्र उठाए अपनी ओर आते देख पितामह भीष्म भयभीत नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दिए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। भीष्म मन ही मन प्रसन्न थे कि उनके आराध्य ने उनकी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए अपनी ही प्रतिज्ञा तोड़ दी।
भीष्म के वचन और श्रीकृष्ण का प्रेम
पितामह भीष्म ने प्रेम और श्रद्धा से भरकर कहा, "हे प्रभु! आइए, आपका ही चक्र मेरा वध करे। इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए क्या हो सकता है कि मेरे प्राण आपके ही हाथों जाएं।"
भीष्म के इन समर्पण भरे वचनों को सुनकर श्रीकृष्ण का क्रोध शांत हो गया। उन्हें अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण हुआ और वे वापस रथ पर लौट आए। इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि भगवान अपने भक्तों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपने वचनों को भी ताक पर रख सकते हैं।
