Mahabharata: जब टूटा अर्जुन का 'अहंकार' और हनुमान जी से मिला उन्हें जीवन का सबसे बड़ा सबक!

PC: NEWS18 HINDI
महाभारत काल की अनेक गाथाएं हमें वीरता, धर्म और नीति का पाठ पढ़ाती हैं। लेकिन इस महाकाव्य में कुछ ऐसी गुप्त और प्रेरक कथाएं भी छिपी हैं, जो जीवन से अहंकार को मिटाने का संदेश देती हैं। ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प कथा है—धनुर्धर अर्जुन और पवनपुत्र हनुमान जी की भेंट।
आइए जानते हैं कि कैसे अर्जुन के धनुर्विद्या के अभिमान को हनुमान जी ने पल भर में तोड़ दिया था:
जब अर्जुन को हुआ अपनी धनुर्विद्या पर अभिमान
एक बार रामेश्वरम के तट पर घूमते हुए अर्जुन ने देखा कि वहां भगवान श्रीराम द्वारा बनाया गया समुद्र पर नल-नील का सेतु (पुल) मौजूद है।
तभी अर्जुन के मन में विचार आया कि, "भगवान राम इतने महान धनुर्धर थे, तो उन्होंने पत्थरों का सेतु क्यों बनवाया? वे चाहते तो अपने तीक्ष्ण बाणों (Arrows) से ही बाणों का मजबूत पुल बना सकते थे, जो सेना का भार सह लेता!"
पास के एक वृक्ष पर बैठे हनुमान जी (जो एक साधारण वानर का रूप धारण किए हुए थे) ने अर्जुन के मन की बात सुन ली और मुस्कुराते हुए बोले, "हे पार्थ! बाणों का पुल इतना मजबूत नहीं हो सकता था। श्रीराम की सेना में मुझ जैसे विशालकाय वानर थे, बाणों का पुल हमारे वजन से तुरंत टूट जाता।"
अर्जुन की शर्त और बाणों का पुल
अर्जुन अपने बाणों की श्रेष्ठता पर बहुत घमंडी थे। उन्होंने वानर रूपी हनुमान जी को चुनौती दी:
"मैं अभी इस जलाशय पर बाणों का ऐसा पुल बनाता हूँ। यदि तुम उस पर पैर रखोगे और वह टूट गया, तो मैं स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दूँगा। और यदि वह नहीं टूटा, तो तुम्हें मेरी श्रेष्ठता स्वीकार करनी होगी।"
हनुमान जी ने चुनौती स्वीकार कर ली। अर्जुन ने अपने दिव्य बाणों का प्रयोग कर जलाशय पर एक सुदृढ़ और सुंदर बाण-सेतु तैयार कर दिया।
हनुमान जी का एक कदम और टूटता अहंकार
जैसे ही अर्जुन का बाण-सेतु तैयार हुआ, हनुमान जी ने श्रीराम का नाम स्मरण किया और अपना विशाल रूप धारण कर जैसे ही पहला कदम उस पुल पर रखा, अर्जुन का बाणों का पुल तिनके की तरह चरमरा कर ढह गया!
अर्जुन यह देखकर स्तब्ध रह गए। उनका अहंकार चूर-चूर हो चुका था। अपनी शर्त के अनुसार अर्जुन अग्नि समाधि लेने के लिए तत्पर हुए।
तभी वहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए अर्जुन से कहा, "अर्जुन! जब तुमने पहली बार पुल बनाया था, तब उसमें मेरा स्मरण नहीं था, बल्कि केवल तुम्हारा 'अहंकार' था। जब हनुमान जी ने कदम रखा, तब मैंने स्वयं 'कछुए' (कूर्म रूप) का अवतार लेकर नीचे से उस पुल को संभाला था, फिर भी तुम शर्त हार गए।"
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
अहंकार का पतन: आपकी विद्या, कौशल या शक्ति कितनी भी महान क्यों न हो, अहंकार हमेशा विनाश की ओर ले जाता है।
समर्पण ही शक्ति है: जब तक कर्म में ईश्वर का स्मरण और नम्रता (Humility) न हो, तब तक सफलता अधूरी रहती है।
इसी घटना के बाद हनुमान जी ने अर्जुन को वचन दिया था कि वे महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ (कपिध्वज) की ध्वजा पर विराजमान रहेंगे और पूरे युद्ध में उनके रथ की रक्षा करेंगे!
