Mahabharata: जब भीष्म के प्रहार से डगमगाया अर्जुन का रथ, संकट के क्षण में श्रीकृष्ण को क्यों याद आए दारुक?

PC: In khabar
महाभारत का कुरुक्षेत्र केवल योद्धाओं के शौर्य का नहीं, बल्कि कई अनसुलझे रहस्यों और दिव्य प्रसंगों का साक्षी भी रहा है। ऐसा ही एक रोचक प्रसंग पितामह भीष्म के घातक बाणों, भगवान श्रीकृष्ण और उनके मुख्य सारथि दारुक से जुड़ा हुआ है।
भीष्म के बाणों से युद्धभूमि में छाया संकट
महाभारत युद्ध के दौरान कौरव सेनापति पितामह भीष्म का पराक्रम चरम पर था। भीष्म ने पांडव सेना पर बाणों की ऐसी तीव्र बौछार की कि स्वयं महाबली अर्जुन का रथ डगमगाने लगा और उसके अश्व घायल होने लगे। अर्जुन जैसे महान धनुर्धर के लिए भी भीष्म के तीरों का सामना करना कठिन हो रहा था। युद्धभूमि की इस विषम परिस्थिति को देखकर पांडव खेमे में चिंता की लहर दौड़ गई।
कौन थे श्रीकृष्ण के सारथि दारुक?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दारुक भगवान श्रीकृष्ण के निजी और परम भक्त सारथि थे। वे द्वारका में श्रीकृष्ण के दिव्य रथ और घोड़ों की देखरेख करते थे। जनश्रुतियों और लोककथाओं के अनुसार, जब भीष्म के प्रहारों से अर्जुन का रथ संकट में पड़ा, तब श्रीकृष्ण ने मन ही मन अपने सारथि दारुक का स्मरण किया। स्मरण करते ही दिव्य रथ की शक्ति और सहायता युद्धभूमि में उपस्थित हो गई।
मार्गदर्शक के रूप में श्रीकृष्ण का महत्व
महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण ने स्वयं शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी और अर्जुन के सारथि बनना स्वीकार किया था। वे केवल रथ की रास नहीं संभाल रहे थे, बल्कि विषम परिस्थितियों में अर्जुन का मनोबल और मार्गदर्शन भी कर रहे थे। युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर धर्म, कर्म और कर्तव्य का पाठ पढ़ाने वाले श्रीकृष्ण ही वास्तव में इस धर्म-युद्ध के सबसे बड़े सूत्रधार थे।
