भीष्म की प्यास बुझाने जमीन से निकली गंगा, मृत्यु के बाद मां ने आंसुओं से बुझाई चिता! जानकर उड़ जाएंगे होश

PC; inkhabar
महाभारत में भीष्म पितामह का जीवन जितना त्याग, वीरता और धर्म का प्रतीक रहा, उनके जीवन का अंतिम अध्याय उतना ही भावुक करने वाला है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होकर भीष्म बाणों की शय्या पर लेट गए थे। इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त होने के कारण वे प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
जब अर्जुन के बाण से प्रकट हुई गंगा की धारा
बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म को जब तीव्र प्यास लगी, तो उन्होंने जल की इच्छा जताई। तब अर्जुन ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर धरती को भेद दिया, जिससे गंगा की शीतल धारा फूट पड़ी और भीष्म ने अपनी प्यास बुझाई। यह प्रसंग इसलिए भी अलौकिक माना जाता है क्योंकि देवी गंगा स्वयं भीष्म (देवव्रत) की जन्मदात्री मां थीं।
उत्तरायण में भीष्म ने त्यागे प्राण
सूर्य के उत्तरायण होते ही भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों की मौजूदगी में भीष्म पितामह ने अपने देह का त्याग कर दिया। पूरे कुरु वंश में शोक की लहर दौड़ गई और हस्तिनापुर के इस महान संरक्षक के अंतिम संस्कार की तैयारियाँ शुरू की गईं।
मां गंगा के आंसुओं से शांत हुई चिता की अग्नि
लोककथाओं के अनुसार, जब भीष्म की चिता को अग्नि दी गई, तो मां गंगा अपने पुत्र के वियोग में व्याकुल होकर रो पड़ीं। कहा जाता है कि उनके आंसुओं की प्रबल धारा से चिता की अग्नि शांत हो गई थी। यह प्रसंग मां और पुत्र के उस अनमोल और अटूट संबंध को दर्शाता है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक बना रहा।
