आखिर क्यों उर्वशी के श्राप के बाद अर्जुन बने थे 'बृहन्नला"! अज्ञातवास में धारण करना पड़ा था स्त्री रूप, जानें रोचक कथा

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महाभारत के अनुसार, चौपड़ पासे का खेल में हारने के बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला था। शर्त यह थी कि अज्ञातवास के दौरान यदि पांडवों को पहचान लिया जाता, तो उन्हें पुनः 12 वर्षों के लिए जंगलों में भटकना पड़ता। ऐसे में अपनी वास्तविक पहचान छिपाने के लिए अर्जुन ने 'बृहन्नला' नाम से एक नर्तक का रूप धारण किया और राजा विराट की पुत्री उत्तरा को संगीत व नृत्य सिखाने लगे।
उर्वशी से जुड़ा है पूरा प्रसंग
इस घटना के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी है। जब अर्जुन अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा लेने देवलोक गए थे, तब अप्सरा उर्वशी उन पर मोहित हो गईं। उन्होंने अर्जुन के समक्ष प्रेम का प्रस्ताव रखा, लेकिन अर्जुन ने उन्हें कुरुवंश की पूर्वज परंपरा की स्त्री मानते हुए और उनके प्रति मातृभाव व्यक्त करते हुए उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अर्जुन के इस व्यवहार से उर्वशी क्रोधित हो गईं और उन्होंने उन्हें नपुंसक होने का श्राप दे दिया।
जब अर्जुन व्यथित हुए, तो उनके पिता देवराज इंद्र ने उन्हें समझाया कि यह श्राप जीवन में एक वरदान की तरह काम आएगा। इंद्रदेव के मध्यस्थता से इस श्राप की अवधि को केवल 1 वर्ष तक सीमित कर दिया गया।
अज्ञातवास में मददगार बना श्राप
जब पांडवों को राजा विराट के राज्य में छिपकर रहना पड़ा, तो अर्जुन ने उर्वशी के उसी श्राप का उपयोग अपनी पहचान छिपाने के लिए किया। वे धनुर्विद्या छोड़कर स्त्रियों के वस्त्रों में 'बृहन्नला' बनकर राजमहल में रहने लगे। उनकी विशाल काया और युद्ध कौशल से कोई उन्हें पहचान न सके, इसलिए यह रूप बेहद कारगर साबित हुआ।
शमी वृक्ष से निकाले अस्त्र
अज्ञातवास की समय-सीमा पूरी होने के अंतिम क्षणों में जब कौरवों ने विराट नगर पर आक्रमण किया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने बाण व गांडीव धनुष निकालकर कौरव सेना को परास्त कर दिया। इस प्रकार, जो श्राप अर्जुन के लिए एक समय अपमानजनक लग रहा था, वही उनके अज्ञातवास को सफलतापूर्वक पूरा करने का सबसे बड़ा जरिया बना।
