ITR 2026: EPF या NPS? रिटर्न भरने से पहले जानें किस टैक्स रिजीम में मिलेगा ज्यादा टैक्स बचाने का फायदा

भारत में हर साल आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने का समय आते ही टैक्स बचाने के विकल्पों पर चर्चा तेज हो जाती है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 31 जुलाई 2026 ITR दाखिल करने की अंतिम तिथि नजदीक है। ऐसे में नौकरीपेशा लोग यह समझना चाहते हैं कि कौन-सा निवेश न सिर्फ रिटायरमेंट के लिए मजबूत फंड तैयार करेगा, बल्कि टैक्स बचाने में भी मदद करेगा।
सरकार की दो लोकप्रिय रिटायरमेंट योजनाएं एम्प्लॉयी प्रोविडेंट फंड (EPF) और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) लंबे समय से निवेशकों की पहली पसंद रही हैं। हालांकि इन दोनों योजनाओं से मिलने वाले टैक्स लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपने पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) चुनी है या नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime)। इसलिए रिटर्न फाइल करने से पहले दोनों विकल्पों को अच्छी तरह समझना जरूरी है।
EPF और NPS क्या हैं?
एम्प्लॉयी प्रोविडेंट फंड (EPF) संगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए एक अनिवार्य बचत योजना है। इसमें कर्मचारी और नियोक्ता (Employer) दोनों हर महीने कर्मचारी के मूल वेतन और निर्धारित भत्तों का एक हिस्सा जमा करते हैं। यह राशि समय के साथ ब्याज के साथ बढ़ती रहती है और रिटायरमेंट के समय एक बड़ा फंड तैयार करती है।
दूसरी ओर, नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) एक स्वैच्छिक रिटायरमेंट निवेश योजना है, जिसका संचालन पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) करती है। इसमें निवेश की गई राशि विभिन्न मार्केट-लिंक्ड एसेट्स में लगाई जाती है, जिससे लंबे समय में बेहतर रिटर्न और पेंशन की व्यवस्था का लक्ष्य रखा जाता है।
दोनों योजनाओं का उद्देश्य भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है, लेकिन टैक्स लाभ के नियम अलग-अलग हैं।
पुरानी टैक्स व्यवस्था में मिलता है ज्यादा फायदा
यदि आपने पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनी है और टैक्स बचाने वाले निवेश करते हैं, तो EPF और NPS दोनों आपके टैक्स बोझ को काफी कम कर सकते हैं।
EPF पर Section 80C का लाभ
कर्मचारी द्वारा EPF में किए गए योगदान पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत टैक्स छूट मिलती है।
- अधिकतम टैक्स कटौती: ₹1.5 लाख प्रति वित्त वर्ष
- यह सीमा Section 80C के कुल निवेश की अधिकतम सीमा में शामिल होती है।
NPS से अतिरिक्त टैक्स बचत
अगर आप NPS Tier-I खाते में स्वयं निवेश करते हैं, तो Section 80CCD(1B) के तहत अतिरिक्त टैक्स छूट का लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं।
- अतिरिक्त कटौती: ₹50,000
- यह लाभ Section 80C की ₹1.5 लाख की सीमा से अलग और अतिरिक्त होता है।
दोनों योजनाओं से कुल कितनी टैक्स बचत संभव?
यदि कोई व्यक्ति EPF और NPS दोनों में पात्र निवेश करता है, तो वह कुल ₹2 लाख तक की टैक्स कटौती का दावा कर सकता है।
| निवेश का प्रकार | अधिकतम टैक्स कटौती |
|---|---|
| Section 80C के तहत EPF व अन्य निवेश | ₹1,50,000 |
| Section 80CCD(1B) के तहत NPS | ₹50,000 |
| कुल संभावित टैक्स कटौती | ₹2,00,000 |
यही कारण है कि टैक्स बचाने वाले निवेशकों के लिए पुरानी टैक्स व्यवस्था अब भी आकर्षक विकल्प मानी जाती है।
नई टैक्स व्यवस्था में क्या बदल जाता है?
नई टैक्स व्यवस्था में सरकार ने आयकर की दरें कम रखी हैं, लेकिन इसके बदले अधिकांश निवेश आधारित टैक्स छूट समाप्त कर दी गई हैं।
यदि आपने नई टैक्स व्यवस्था अपनाई है, तो:
- EPF में कर्मचारी के योगदान पर Section 80C का लाभ नहीं मिलेगा।
- स्वयं किए गए NPS निवेश पर Section 80CCD(1B) की अतिरिक्त ₹50,000 की छूट भी उपलब्ध नहीं होगी।
- यानी व्यक्तिगत निवेश के आधार पर टैक्स योग्य आय कम नहीं होगी।
इस वजह से नई टैक्स व्यवस्था चुनने वाले निवेशकों को टैक्स बचत के लिहाज से सीमित विकल्प मिलते हैं।
नई टैक्स व्यवस्था में भी NPS का एक बड़ा फायदा
हालांकि नई टैक्स व्यवस्था में अधिकांश कटौतियां समाप्त हो चुकी हैं, लेकिन Employer Contribution to NPS पर मिलने वाला लाभ अब भी जारी है।
आयकर अधिनियम की Section 80CCD(2) के तहत नियोक्ता द्वारा कर्मचारी के NPS खाते में किया गया योगदान टैक्स लाभ के लिए पात्र रहता है।
वर्तमान नियमों के अनुसार:
- नियोक्ता बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते (DA) का 14% तक NPS में जमा कर सकता है।
- निर्धारित सीमा तक यह राशि कर्मचारी के लिए टैक्स मुक्त मानी जाती है।
इसलिए यदि आपकी कंपनी NPS में योगदान देती है, तो नई टैक्स व्यवस्था में भी यह एक महत्वपूर्ण टैक्स लाभ बना रहता है।
किस टैक्स व्यवस्था में कौन-सा विकल्प बेहतर?
यह पूरी तरह आपकी आय, निवेश की आदत और टैक्स प्लानिंग पर निर्भर करता है।
यदि आप हर साल EPF, NPS, जीवन बीमा, होम लोन के मूलधन और अन्य टैक्स बचाने वाले निवेश करते हैं, तो पुरानी टैक्स व्यवस्था अधिक लाभदायक साबित हो सकती है।
वहीं जिन लोगों के पास सीमित टैक्स बचत वाले निवेश हैं और जो कम टैक्स दरों के साथ सरल टैक्स सिस्टम चाहते हैं, उनके लिए नई टैक्स व्यवस्था बेहतर विकल्प हो सकती है।
निवेश का फैसला केवल टैक्स देखकर न करें
विशेषज्ञों का मानना है कि EPF और NPS का चयन केवल टैक्स बचत के आधार पर नहीं करना चाहिए। निवेश करते समय रिटायरमेंट की जरूरत, जोखिम उठाने की क्षमता, संभावित रिटर्न, निवेश की अवधि और नियोक्ता द्वारा मिलने वाले लाभ जैसे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है।
EPF सुरक्षित और स्थिर रिटर्न देने वाली योजना है, जबकि NPS में बाजार आधारित निवेश होने के कारण लंबे समय में बेहतर रिटर्न की संभावना रहती है।
निष्कर्ष
EPF और NPS दोनों ही रिटायरमेंट के लिए मजबूत वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने वाली योजनाएं हैं। यदि आप पुरानी टैक्स व्यवस्था अपनाते हैं, तो EPF और NPS के जरिए सालाना ₹2 लाख तक की टैक्स कटौती का लाभ लिया जा सकता है। वहीं नई टैक्स व्यवस्था में व्यक्तिगत निवेश पर अधिकांश छूट नहीं मिलती, लेकिन नियोक्ता द्वारा NPS में किया गया योगदान अब भी टैक्स लाभ दिलाता है।
